पात्र :
1. सूत्रधार
2. अरुण (निराश युवक)
3. विजय (प्रश्न करने वाला मित्र)
4. भाई / मार्गदर्शक
दृश्य :
एक पार्क में दो मित्र बैठे हैं। अरुण चिंतित और निराश दिखाई देता है।
अरुण :
हम कमजोर हैं... हमारे पास साधन नहीं हैं, ताकत नहीं है, पैसा नहीं है।
जिसके पास पैसा है, वही दबाता है।
जिसके पास ताकत है, वही डराता है।
विजय :
तो क्या तुम यह मान बैठे हो, कि जब तक कोई और आकर तुम्हें शक्ति नहीं देगा, तब तक तुम ऐसे ही रहोगे ?
अरुण :
जब तक व्यवस्था नहीं बदलेगी, जब तक न्याय पूरी तरह लागू नहीं होगा, तब तक शोषण और उत्पीड़न कैसे रुकेगा ?
विजय :
तो क्या तब तक तुम अपने भीतर की ताकत को भी बंद रखोगे ?
क्या तब तक डरते रहोगे ?
क्या तब तक खुद को कमजोर मानते रहोगे ?
अरुण :
लेकिन खाली आत्मविश्वास से क्या होगा ?
(तभी भाई प्रवेश करते हैं)
भाई :
आत्मविश्वास का अर्थ हथियार उठाना नहीं होता।
आत्मविश्वास का अर्थ है — ज्ञान पाना, संगठित होना, अपनी आवाज उठाना और अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना।
अरुण :
लेकिन जिनके पास शक्ति है, वे तो डरते नहीं हैं।
भाई :
डर और साहस का संबंध केवल संख्या, धन या हथियार से नहीं होता।
इतिहास गवाह है कि कई बार सबसे बड़े परिवर्तन उन लोगों ने किए हैं जिनके पास संसाधन कम थे, लेकिन विश्वास बड़ा था।
विजय :
मतलब इज्जत की रक्षा गुस्से से नहीं, जागरूकता और साहस से होती है ?
भाई :
बिल्कुल।
जीवन भी जरूरी है और सम्मान भी।
लेकिन सम्मान की सबसे मजबूत नींव शिक्षा, आत्मसम्मान और एकता होती है, न कि अंधी टक्कर।
सूत्रधार :
समाज बदलने की प्रतीक्षा करना एक बात है, लेकिन स्वयं बदलने की शुरुआत करना दूसरी।
जो व्यक्ति अपने भीतर का भय जीत लेता है, वह परिस्थितियों से हारता नहीं।
AK Singh

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